Thursday, 31 October 2019

Famous Astrologer "Divyansh Jyotish Kendra": भगवान सूर्य देव की बहन ख़ष्ठी मईया का पूजन 31 अक्टू...

Famous Astrologer "Divyansh Jyotish Kendra": भगवान सूर्य देव की बहन ख़ष्ठी मईया का पूजन 31 अक्टू...: भगवान सूर्य देव की बहन ख़ष्ठी मईया का पूजन 31 अक्टूबर-2019 से प्रारम्भ:- जानिए इसके पीछे का इतिहास,भारतवर्ष के ऐतिहासिक सूर्य मंदिर एवं शुभ...
भगवान सूर्य देव की बहन ख़ष्ठी मईया का पूजन 31 अक्टूबर-2019 से प्रारम्भ:-
जानिए इसके पीछे का इतिहास,भारतवर्ष के ऐतिहासिक सूर्य मंदिर एवं शुभ
मुहूर्त :-
छठ पूजा भारत में भगवान सूर्य की उपासना का सबसे प्रसिद्ध हिंदू त्‍योहार है।इस त्‍योहार
को षष्ठी तिथि पर मनाया जाता है, जिस कारण इसे सूर्य षष्ठी व्रत या छठ कहा गया है. यह
त्‍योहार एक साल में दो बार मनाया जाता है- पहली बार चैत्र महीने में और दूसरी बार
कार्तिक महीने में. हिन्दू पंचांग की की अगर बात करें तो, चैत्र शुक्लपक्ष की षष्ठी पर मनाए
जाने वाले छठ त्‍योहार को चैती छठ कहा जाता है जबकि कार्तिक शुक्लपक्ष की षष्ठी पर
मनाए जाने वाले इस त्‍योहार को कार्तिकी छठ कहा जाता है:-

छठ पूजा पर्व तिथि व मुहूर्त 2019
31 अक्तूबर, गुरुवार: नहाय-खाय
1 नवंबर, शुक्रवार : खरना
2 नवंबर, शनिवार: डूबते सूर्य को अर्घ्य
3 नवंबर, रविवार : उगते सूर्य को अर्घ्य और पारण
पूजा विधि : -

भगवान सूर्य देव को सम्पूर्ण रूप से समर्पित यह त्योहार पूरी स्वच्छता के साथ मनाया जाता है|
इस व्रत को पुरुष और स्त्री दोनों ही सामान रूप से धारण करते है| यह पावन पर्व पुरे चार दिनों
तक चलता है|
व्रत के पहले दिन यानी कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को नहाए खाए होता है, जिसमे सारे वर्ती आत्म
सुद्धि के हेतु केवल शुद्ध आहार का सेवन करते है|
कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन खरना रखा जाता है, जिसमे शरीर की शुधि करण के बाद पूजा
करके सायं काल में ही गुड़ की खीर और पुड़ी बनाकर छठी माता को भोग लगाया जाता है| इस
खीर को प्रसाद के तौर पर सबसे पहले वर्तियों को खिलाया जाता है और फिर ब्राम्हणों और
परिवार के लोगो में बांटा जाता है|
कार्तिक शुक्ल षष्टि के दिन घर में पवित्रता के साथ कई तरह के पकवान बनाये जाते है और
सूर्यास्त होते ही सारे पकवानों को बड़े-बड़े बांस के डालों में भड़कर निकट घाट पर ले जाया

जाता है| नदियों में ईख का घर बनाकर उनपर दीप भी जलाये जाते है| व्रत करने वाले सारे स्त्री
और पुरुष जल में स्नान कर इन डालों को अपने हाथों में उठाकर षष्टी माता और भगवान सूर्य
को अर्ग देते है| सूर्यास्त के पश्चात अपने-अपने घर वापस आकर सह-परिवार रात भर सूर्य देवता
का जागरण किया जाता है
कार्तिक शुक्ल सप्तमी को सूर्योदय से पहले ब्रम्ह मुहूर्त में सायं काल की भाती डालों में पकवान,
नारियल और फलदान रख नदी के तट पर सारे वर्ती जमा होते है| इस दिन व्रत करने वाले
स्त्रियों और पुरुषों को उगते हुए सूर्य को अर्ग देना होता है| इसके बाद छठ व्रत की कथा सुनी
जाती है और कथा के बाद प्रसाद वितरण किया जाता है| सरे वर्ती इसी दिन प्रसाद ग्रहण कर
पारण करते है|

छठ पूजा सामग्री की सूची :-
   प्रसाद रखने के लिए बांस की दो तीन बड़ी टोकरी।
   बांस या पीतल के बने तीन सूप, लोटा, थाली, दूध और जल के लिए ग्लास।
    नए वस्त्र साड़ी-कुर्ता पजामा।
   चावल, लाल सिंदूर, धूप और बड़ा दीपक।
   पानी वाला नारियल, गन्ना जिसमें पत्ता लगा हो।
    सुथनी और शकरकंदी।
   हल्दी और अदरक का पौधा हरा हो तो अच्छा।
    नाशपाती और बड़ा वाला मीठा नींबू, जिसे टाब भी कहते हैं।
   शहद की डिब्बी, पान और साबुत सुपारी।
    कपूर, कुमकुम, चन्दन, मिठाई।
इसके साथ ही ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पूड़ी, खजूर, सूजी का हलवा, चावल का बना लड्डू, जिसे
लडु़आ भी कहते हैं आदि प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाएगा।

छठ पूजा 2019: महोत्सव का इतिहास और महत्व:-
छठ केवल एक पर्व ही नहीं है बल्कि महापर्व है जो कुल चार दिन तक चलता है। नहाय-खाय
से लेकर उगते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य देने तक चलने वाले इस पर्व का अपना एक
ऐतिहासिक महत्व है।

छठ पर्व कैसे शुरू हुआ इसके पीछे कई ऐतिहासिक कहानियां प्रचलित हैं
1- पुराण में छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है। कहते हैं राजा प्रियंवद
को कोई संतान नहीं थी तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की
पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वो
पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ।
प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान
की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुई जो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसी
कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने राजा को उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए
प्रेरित करने को कहा।

राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई।
कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी और तभी से छठ पूजा होती है।
2-इस कथा के अलावा एक कथा राम-सीता जी से भी जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के
मुताबिक जब राम-सीता 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से
मुक्त होने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया।
पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया । मुग्दल ऋषि ने मां सीता पर गंगा जल
छिड़क कर पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की
उपासना करने का आदेश दिया। जिसे सीता जी ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों
तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।
3-एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। इसकी शुरुआत
सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और
वो रोज घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान
योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है।
4- छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। इस कथा के मुताबिक जब पांडव अपना सारा

राजपाठ जुए में हार गए तब दौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी
हुई थी और पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था। लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य
देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना
फलदायी मानी गई।
5-एक मान्यता के अनुसार लंका पर विजय प्राप्‍त करने के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन
कार्तिक शुक्ल षष्ठी यानी छठ के दिन भगवान राम और माता सीता ने व्रत किया था और
सूर्यदेव की आराधना की थी. सप्तमी को सूर्योदय के समय फिर से अनुष्ठान कर सूर्यदेव से
आशीर्वाद प्राप्त किया था.

परंपरा के अनुसार छठ पर्व के व्रत को स्त्री और पुरुष समान रूप से रख सकते हैं. छठ पूजा की
परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली पौराणिक और लोककथाओं के अनुसार
यह पर्व सर्वाधिक शुद्धता और पवित्रता का पर्व है.
~~~~~~~~~~~~~~~
भारतवर्ष के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर:-
~~~~~~~~~~~~~~~
1-पश्चिमाभिमुख देव सूर्य मंदिर, औरंगाबाद (बिहार)
2-कोणार्क सूर्य मंदिर, पुरी (उड़ीसा)
3-सूर्य मंदिर, रांची (झारखंड)
4-विवस्वान सूर्य मंदिर, ग्वालियर (मध्यप्रदेश)
5-बेलार्क सूर्य मंदिर, भोजपुर (बिहार)
6-मोढ़ेरा सूर्य मंदिर, पाटन (गुजरात)
आचार्य राजेश कुमार

Saturday, 26 October 2019

दीपावली पूजन पूजन  विधी मुहूर्त 27/10/2019 :-

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त

शाम -7 बजकर 15 मिनट से 8 बजकर 36 मिनट तक

प्रदोश काल- शाम 6 बजकर 4 मिनट से 8 बजकर 36 मिनट तक

वृषभ काल- शाम 7 बजकर 15 मिनट से 9 बजकर15 मिनट तक

लक्ष्मी पूजा चौघड़िया-

2019
दोपहर शुभ पूजा मुहूर्त- दोपहर 1 बजकर

48
से 3 बजकर 13 मिनट तक शाम शुभ,

अमृत, खडोपचार पूजा मुहूर्त शाम 6 बजकर 04

मिनट से 10 बजकर 48 तक



दिवाली की पूजा विधि -

दिवाली के दिन भगवान गणेश और मां लक्ष्मी तथा कुबेर जी की

पूजा का विधान है।

गृहस्थ के लोगो को वृषभ काल स्थिर लग्न में पूजा करनी चाहिए ।

दिवाली की शाम को पूजा स्थल पर एक

चौकी बिछांए। इसके बाद गंगाजल डालकर चौकी

को साफ करें। इसके बाद भगवान गणेश और मां

लक्ष्मी तथा कुबेर जी की प्रतिमा को स्थापित करें।

पूजा स्थल पर गणेश जी के सामने दाहिनी तरफ आटे से

नवग्रह बनाए और पास में जल से भरा कलश रखें

। उस कलश में कुछ कौड़ियां,गोमती चक्र, सिक्के

सुपारी, शहद ,गंगा जल इत्यादि डालें।

उस कलश पर रोली

से स्वस्तिक बना लें और मोली से कलश को 5 बार लपेट दें।

उस पर आम के पत्ते लगाकर बड़ी दियाली से

कलश को ढक दें । उस दीयाली में चावल रखें

चावल के ऊपर लाल कपड़े में लपेट कर जटा

नारियल

रखें।

इसके बाद पूजा स्थल पर किसी लाल कपड़े की थैली में

कौड़ियां5, गोमती चक्र5, हल्दी की गांठें5, सबूत बादाम 21 रखें ।

,
पंच मेवा, गुड़ फूल , मिठाई,घी , कमल

का फूल ,खील बतासे आदि भगवान गणेश और मां


लक्ष्मी के आगे रखें। धनतेरस में खरीदे गए समान भी पूजा स्थान पर ही रखें ।

भगवान गणेश और मां लक्ष्मीजी एवं कुबेर जी के

आगे घी का दीपक 5 या 11 जलाएं और

आवश्यकतानुसार कड़ू तेल के

दीपक तैयार कर रखे। पूजा समाप्ति पर अन्य

दीपक को मूर्ति के सामने के दीपक से प्रज्ज्वलित

कर घर में सभी स्थान पर रखवाएं।

अब अपने दाहिने हाथ में जल अक्षत पुष्प लेकर

गणेश लक्ष्मी जी का ध्यान करते हुए संकल्प लेकर

जमीन पर छोड़ दें। अब सभी मूर्तियों को तिलक

कर घर के सदस्यों को तिलक लगाएं। अब समस्त

सामग्रियों पर गंगा जल छिड़क दें।

अब विधिवत गणेश और मां लक्ष्मी जी के साथ ही

कुबेर

जी की पूजा करें अर्थात गणेशअथर्व शिष और मां

लक्ष्मी जी का श्री सूक्तम का पाठ तथा कुबेर जी

का पूजन करें।

पूजन के पश्चात आरती करें। दूसरे दिन सुबह लाल

थैले को पूजा स्थान या लाकर में रख दें।

दिवाली के दिन लोग आपने गहनों ,पैसों और बहीखातों की भी पूजा करते हैं।

माना जाता है ऐसा करने से मां लक्ष्मी का घर में

वास होता है और धन की कभी भी कोई कमीं नही

रहती है।
  आचार्य राजेश कुमार

Wednesday, 23 October 2019


              "दिव्यांश ज्योतिष् केंद्र"
         
धनत्रयोदशी:-धनतेरस' स्थाई सुख, धन और समृद्धि
प्राप्त करने का दिन:--इस दिन यमदेव की पूजा

करने से घर में असमय मृ्त्यु का भय नहीं रहता है

धनतेरस पर आपनी राशि के अनुसार वस्तु खरीदने
से होता है शुभ... धनतेरस पर किन वस्तुओं का दान करके बन सकते हैं धनवान:-
---------------------------------------
       उत्तरी भारत में कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन दिनांक 25 अक्टूबर 2019 को धनतेरस का पर्व पूरी श्रद्धा व विश्वास से मनाया जाएगा. देव धनवन्तरी के अलावा इस दिन, देवी लक्ष्मी जी और धन के देवता कुबेर के पूजन की परम्परा है.
       इसी दिन यमदेव को भी दीपदान किया जाता है. इस दिन यमदेव की पूजा करने के विषय में एक मान्यता है कि इस दिन यमदेव की पूजा करने से घर में असमय मृ्त्यु का भय नहीं रहता है. धन त्रयोदशी के दिन यमदेव की पूजा करने के बाद घर से बाहर कुड़ा रखने वाले स्थान पर दक्षिण दिशा की ओर दीपक पूरी रात्रि जलाना चाहिए. इस दीपक में कुछ पैसा व कौडी भी डाली जाती है.
      
   धनतेरस पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रदोष काल के दौरान होता है जब स्थिर लग्न होती है। ऐसा माना जाता है कि अगर स्थिर लग्न के दौरान धनतेरस पूजा की जाये तो लक्ष्मीजी घर में ठहर जाती है।
   धनतेरस का पंचांग और शुभ मुहूर्त :-
  
धनतेरस की तिथि: 25 अक्‍टूबर 2019
त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 25 अक्‍टूबर 2019 को शाम 07.08 बजे से
त्रयोदशी तिथि समाप्‍त: 26 अक्‍टूबर 2019 को दोपहर 03.36 बजे तक
धनतेरस पूजा और खरीदारी का शुभ मुहूर्त: 25 अक्‍टूबर 2019 को शाम 07.08 बजे से रात 08.13 बजे तक
अवधि: 01 घंटे 05 मिनट
इस शुभ मुहूर्त में पूजा करने से धन, स्वास्थ्य और आयु बढ़ती है।
धनत्रयोदशी के दिन भगवान धनवंतरी का जन्म हुआ था और इसीलिए इस दिन को धन तेरस के रूप में पूजा जाता है. दीपावली के दो दिन पहले आने वाले इस त्योहार को लोग काफी धूमधाम से मनाते हैं. इस दिन गहनों और बर्तन की खरीदारी जरूर की जाती है.धनवंतरि' चिकित्सा के देवता भी हैं इसलिए उनसे अच्छे स्वास्थ्य की भी कामना की जाती है।
देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन
शास्त्रों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान त्रयो‍दशी के दिन भगवान धनवंतरी प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन को धन त्रयोदशी कहा जाता है. धन और वैभव देने वाली इस त्रयोदशी का विशेष महत्व माना गया है.
कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय बहुत ही दुर्लभ और कीमती वस्तुओं के अलावा शरद पूर्णिमा का चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी के दिन कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धनवंतरी और कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को भगवती लक्ष्मी जी का समुद्र से अवतरण हुआ था. यही कारण है कि दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन और उसके दो दिन पहले त्रयोदशी को भगवान धनवंतरी का जन्म दिवस धनतेरस के रूप में मनाया जाता है.
भगवान धनवंतरी को प्रिय है पीतल :--
---------------- - - ------------
भगवान धनवंतरी को नारायण भगवान विष्णु का ही एक रूप माना जाता है. इनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें से दो भुजाओं में वे शंख और चक्र धारण किए हुए हैं. दूसरी दो भुजाओं में औषधि के साथ वे अमृत कलश लिए हुए हैं. ऐसा माना जाता है कि यह अमृत कलश पीतल का बना हुआ है क्योंकि पीतल भगवान धनवंतरी की प्रिय धातु है.
चांदी खरीदना शुभ:-
-----------------
धनतेरस के दिन लोग घरेलू बर्तन खरीदते हैं, वैसे इस दिन चांदी खरीदना शुभ माना जाता है क्योंकि चांदी चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है और चन्द्रमा शीतलता का मानक है, इसलिए चांदी खरीदने से मन में संतोष रूपी धन का वास होता है क्योंकि जिसके पास संतोष है वो ही सही मायने में स्वस्थ, सुखी और धनवान है।
मान्यता के अनुसार धनतेरस:--
-------------------------
मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई कोई भी वस्तु शुभ फल प्रदान करती है और लंबे समय तक चलती है. लेकिन अगर भगवान की प्रिय वस्तु पीतल की खरीदारी की जाए तो इसका तेरह गुना अधिक लाभ मिलता है.
क्यों है पूजा-पाठ में पीतल का इतना महत्व?
---------------------------------------
पीतल का निर्माण तांबा और जस्ता धातुओं के मिश्रण से किया जाता है. सनातन धर्म में पूजा-पाठ और धार्मिक कर्म हेतु पीतल के बर्तन का ही उपयोग किया जाता है.
ऐसा ही एक किस्सा महाभारत में वर्णित है कि सूर्यदेव ने द्रौपदी को पीतल का अक्षय पात्र वरदानस्वरूप दिया था जिसकी विशेषता थी कि द्रौपदी चाहे जितने लोगों को भोजन करा दें, खाना घटता नहीं था।
यम के पूजा का भी विधान:-
-----------------------
धनतेरस के दिन कुबेर के अलावा देवता यम के पूजा का भी विधान है। धनतेरस के दिन यम की पूजा के संबंध में मान्यता है कि इनकी पूजा से घर में असमय मौत का भय नहीं रहता है।
धनतेरस पर किन वस्तुओं का दान करके बन सकते हैं धनवान:-

१-
धनतेरस के दिन आप किसी गरीब व्‍यक्ति को नए पीले वस्‍त्र दान कर सकते हैं। धनतेरस के दिन वस्‍त्र दान महादान माना गया है। ऐसा करने से आपको विशेष पुण्‍य की प्राप्ति होती है।
2-
धनतेरस के शुभ अवसर पर आपको कम से कम किसी एक गरीब को घर बुलाकर पूरा आदर और सम्‍मान देकर भोजन करवाना चाहिए। भोजन में चावल की खीर और पूड़ी विशेष रूप से शामिल करनी चाहिए। भोजन करवाने के बाद दक्षिणा भी अवश्‍य देनी चाहिए।
3-
धनतेरस के दिन आपको किसी जरूरतमंद व्‍यक्ति को नारियल और मिठाई का दान करना चाहिए। ऐसा करने से आपके भंडार भी साल भर भरे रहते हैं और आपको कभी भी तंगी का सामना नहीं करना पड़ता।
4-
धनतेरस के दिन आप एक ओर सोने-चांदी का सामान खरीद सकते हैं तो दूसरी ओर इस दिन आपको लोहे की धातु की कोई वस्‍तु दान भी करनी चाहिए। लोहा दान करने से आपका दुर्भाग्‍य चला जाता है और आपको शुभ फल की प्राप्ति होती है। लक्ष्‍मी माता आप पर प्रसन्‍न होती हैं।
5-
धनतेरस के दिन कई घरों में नई झाड़ू लाकर उसकी पूजा की जाती है। अगर आपका कोई ऐसा करीबी है जो लगातार पैसों की तंगी से जूझ रहा है तो आप उसे झाड़ू खरीदकर दे सकते हैं। ऐसा करने से मां लक्ष्‍मी आप पर तो प्रसन्‍न होंगी ही साथ में आपके मन की अच्‍छी भावना को देखकर आपके करीबी को भी सम्‍पन्‍न बना देंगी।
झाड़ू की खरीददारी होगी शुभ: 
  धनतेरस के दिन आप सोना खरीदते हैं यह अच्छी बात है लेकिन याद रहे इस दिन आप झाड़ू खरीदें। क्योंकि झाडू़ ही आपके घर द्वार को स्वच्छ रखती है। इस दिन भगवान विष्णु, राम और लक्ष्मी के चरणों का आगमन आपके घर होता है। इसलिए झाड़ू की पूजा करना भी शुभ माना जाता है।
धनतेरस पर राशि अनुसार करें खरीदारी :-

मेष - चांदी या तांबा के बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक सामान

वृष - चांदी या तांबे के बर्तन
मिथुन - स्वर्ण आभूषण, स्टील के बर्तन, हरे रंग के घरेलू सामान, पर्दा
कर्क - चांदी के आभूषण, बर्तन
सिंह - तांबे के बर्तन, वस्त्र, सोना
कन्या - गणेश की मूर्ति, सोना या चांदी के आभूषण, कलश
तुला- वस्त्र, सौंदर्य या सजावट सामग्री, चांदी या स्टील के बर्तन
वृश्चिक - इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सोने के आभूषण, बर्तन

धनु - स्वर्ण आभूषण, तांबे के बर्तन

मकर - वस्त्र, वाहन, चांदी के बर्तन

कुम्भ - सौंन्दर्य के सामान, स्वर्ण, ताम्र पात्र, जूता-चप्पल

मीन - स्वर्ण आभूषण, बर्तन
         आचार्य राजेश कुमार









Friday, 18 October 2019


सूर्य का तुला राशि में गोचर, जानें संक्षिप्त परिचय और  आपकी राशि पर इसका प्रभाव -
एक बार फिर सूर्य देव अब 18 अक्टूबर 2019, शुक्रवार 00:41 बजे कन्या से तुला राशि में गोचर करेंगे। वे 17 नवंबर 2019, रविवार 00:30 बजे तक इसी राशि में स्थित रहेगा।

कुंडली में मौजूद सभी 12 राशियों में से केवल एक राशि सिंह का स्वामित्व सूर्य देव को प्राप्त है। इसके साथ ही सूर्य देव कृतिका, उत्तराफाल्गुनी उत्तराषाढ़ा नक्षत्रों के स्वामी हैं।

राहु की संगति इन्हें ग्रहण भी लगाती है। नवग्रहों में बात करें तो चंद्रमा, मंगल व गुरु इनके मित्र ग्रह हैं जबकि राहू, केतु, शुक्र व शनि के साथ इनकी खास नहीं बनती। बुध के साथ ये समभाव रखते हैं।

सूर्य ग्रह एक राशि में लगभग एक महीने तक रहते हैं। इसी कारण हिंदू पंचांग मास का निर्धारण भी सूर्य की चाल पर होता है। तिथि का आरंभ भी सूर्योदय से ही मानते हैं। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में परिवर्तन को संक्रांति कहा जाता है।
मकर राशि में सूर्य जब प्रवेश करते हैं तो यह समय स्नान-दान पुण्य आदि के लिये बहुत ही शुभ माना जाता है। मकर संक्रांति को बड़े स्तर पर पर्व के रूप में मनाया जाता है। इसे उत्तरायण भी कहते हैं। यहीं से शुभ समय की शुरुआत भी मानी जाती है। मिथुन राशि के पश्चात दक्षिणायन में हो जाते हैं।
तुला राशि में ये नीच के होते हैं तो मेष राशि में उच्च के। इस तरह सूर्य एक बहुत ही प्रभाव शाली ग्रह हैं। जो भी ग्रह सूर्य के समीप आते हैं उन्हें अस्त माना जाता है यानि उनका अपना कोई प्रभाव नहीं रह जाता है। उनके प्रभाव से युक्त सूर्य जातकों के जीवन को बहुत प्रभावित करते हैं। बुध के साथ आने पर बुधादित्य योग बनता है जिसे बहुत ही सौभाग्यशाली माना जाता है।
जातक के स्वास्थ्य पर सूर्य का बहुत असर होता है। वैसे तो सूर्य की गिनती पाप ग्रहों में होती है। लेकिन क्रूर ग्रहों की दृष्टि पड़ने या उनके साथ आने से ही सूर्य नेगेटिव प्रभाव छोड़ते हैं। अन्यथा जातक के जीवन पर सूर्य काफी अच्छा प्रभाव डालते हैं।

सूर्य के इस राशि परिवर्तन का प्रभाव सभी राशियों पर होगा।
ज्योतिष के अनुसार प्रतिदिन सूर्योदय के समय यदि कोई व्यक्ति सूर्य देव को जल चढ़ाये, तो कुंडली में मौजूद सूर्य संबंधित सभी दोषों से मुक्ति मिलती है। सूर्य की उपासना करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। वैदिक ज्योतिष में सूर्य को पूर्वज, पिता, आत्मा और सरकारी सेवा का कारक माना गया है।

 18 अक्टूबर, 2019 को सूर्य ग्रह का तुला राशि में गोचर होने से इसका का प्रभाव सभी 12 राशि के जातकों के जीवन पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों से पड़ने वाला है। तो चलिए जानते हैं कि सूर्य का यह गोचर सभी राशियों के जातकों को किस प्रकार प्रभावित करेगा। 
मेष राशि
सूर्य का गोचर आपकी राशि से सातवें भाव में हो रहा है। इस गोचर के चलते वैवाहिक जीवन और पारिवारिक जीवन में आपको कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। जो कारोबारी साझेदारी में बिज़नेस करते हैं, उन्हें साझेदार के साथ रिश्तों में खटास आ सकती है। इस दौरान प्रेम संबंधों में भी कुछ परेशानियां हो सकती हैं। हालांकि छात्रों के लिए यह समय अच्छा रहेगा। 
वृषभ राशि
सूर्य का यह गोचर आपके छठे भाव में हो रहा है। इस गोचर के दौरान आपको अच्छे फल मिलने की पूरी उम्मीद है। वृषभ राशि के छात्रों के लिए यह गोचर बहुत लाभदायक रहेगा। पारिवारिक जीवन में संपत्ति को लेकर कोई छोटा-मोटा विवाद हो सकता है। वहीँ इस दौरान आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।
मिथुन राशि
सूर्य का यह गोचर आपके पांचवे भाव में हो रहा है। यह गोचर नौकरी पेशा लोगों के लिए शुभ रहेगा। वहीँ छात्रों के लिए यह गोचर बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता। गोचर के दौरान आर्थिक पक्ष कमजोर रह सकता है। वहीँ आपका स्वास्थ्य भी इस अवधि में कमजोर रह सकता है। यह समय प्रेम जीवन के लिए अच्छा रहेगा। 
कर्क राशि
सूर्य का यह गोचर आपके चौथे भाव में हो रहा है। इस गोचर के दौरान माता की सेहत में गिरावट आ सकती है। वैवाहिक जीवन और प्रोफेशनल जिंदगी दोनों में तनाव देखने को मिलेगा। आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए इस राशि के कुछ लोग अपनी प्रोपट्री या अपना पुराना वाहन या बेच सकते हैं। इस दौरान छात्रों को शिक्षा के क्षेत्र में अच्छे फल पाने के लिए सार्थक प्रयास करने पड़ेंगे।
सिंह राशि
सूर्य का यह गोचर आपके तीसरे भाव में हो रहा है। इस गोचर के दौरान आप खुद को ऊर्जावन महसूस करेंगे। स्वास्थ की बात करें तो पुरानी बीमारी से इस दौरान आपको आराम मिल सकता है। इस राशि के नौकरी पेशा लोग कार्यक्षेत्र में नया मुकाम हासिल करेंगे। वहीँ इस राशि के कुछ लोगों को छोटी दूरी की यात्राएं भी करनी पड़ सकती हैं। इस अवधि में सिंह राशि की ग्रहणियां अपने जीवनसाथी के साथ कहीं घूमने जा सकती हैं।
कन्या राशि
सूर्य का यह गोचर आपके दूसरे भाव में होने वाला है। इस समय आपकी वाणी में कड़वाहट देखने को मिलेगी। पारिवारिक जीवन में सही माहौल बनाने के लिए गोचर के दौरान अपने गुस्से पर काबू रखें। इस अवधि में सेहत को लेकर आपको सचेत रहने की जरुरत है। आपको आंखों से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।  इस समय आर्थिक पक्ष को सही रखने के लिए अपने ख़र्चों पर लगाम लगाएँ। प्रेम जीवन में संतुलन बनाने के लिए अहम को पीछे रखें और अपने पार्टनर की बातों को गौर से सुने। 
तुला राशि
सूर्य का गोचर आपकी ही राशि यानि प्रथम भाव या लग्न भाव में हो रहा है। इस गोचर के दौरान आपको स्वास्थ्य संबंधी कुछ परेशानियां हो सकती हैं। परिवार वालों के साथ भी आपका झगड़ा हो सकता है। आर्थिक पक्ष को मजबूत करने के लिए धन संचय करें। इस समय छात्र पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान दे। 
वृश्चिक राशि
सूर्य का यह गोचर आपके बारहवें भाव में होने वाला है। इस गोचर के दौरान इस राशि के कारोबारियों को काम के संबंध में लंबी दूरी की यात्रा करनी पड़ सकती है। सूर्य का गोचर आपके ख़र्चों में बढ़ौतरी कराएगा। स्वास्थ की बात करें तो शारीरिक दर्द और आंतों से जुड़ी परेशानियां आपको हो सकती हैं। छात्रों को अपनी दिक्कतों को लेकर गुरुजनों से बात करनी चाहिए। वहीँ पिता इस दौरान आपको भविष्य के लिए कोई सलाह दे सकते हैं।
धनु राशि
सूर्य का यह गोचर आपके ग्यारहवें भाव में होने वाला है। इस गोचर के दौरान आपको अच्छे फल मिलने की पूरी उम्मीद है। इस समय ऑफिस में आपको सीनियर्स का साथ मिलेगा और लाभ के नये मार्ग खुलेंगे। स्वास्थ्य में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे। इस समय आप अपने परिवार के साथ किसी धार्मिक यात्रा पर जा सकते हैं। पिता के साथ आपके रिश्तों में निखार आएगा। छात्रों का मन इस समय पढ़ाई में खूब लगेगा।
मकर राशि
सूर्य का यह गोचर आपके दसवें भाव में होने वाला है। यह गोचर आपको सरकारी क्षेत्रों से लाभ दिलाएगी। नौकरी करने वालों का इस दौरान प्रोमोशन हो सकता है। आपको सलाह दी जाती है कि बात करते समय शब्दों का सोच समझकर चुनाव करें। पारिवारिक जीवन में कुछ उतार-चढ़ाव आ सकते हैं। इस दौरान आपको शराब सिगरेट जैसे मादक पदार्थों से दूर रहना चाहिए।
कुंभ राशि
सूर्य का यह गोचर आपके नवम भाव में होने वाला है। इस गोचर के दौरान पिता के स्वास्थ्य में गिरावट आने की संभावना है। साथ ही उनसे किसी बात को लेकर मनमुटाव भी हो सकता है। गोचर के इस काल में आर्थिक पक्ष कमजोर रह सकता है। इस समय अपने विरोधियों से सावधान रहने की जरुरत है। सूर्य का यह गोचर आपको आपके प्रेमी से दूर कर सकता है। 
मीन राशि
सूर्य का यह गोचर आपके आठवें भाव में होने वाला है। इस गोचर काल में लक्ष्य हासिल करने में आपको परेशानियां आ सकती हैं। आपको इस गोचर के दौरान अपने गुस्से पर काबू रखने की सलाह दी जाती है। स्वास्थ्य सामान्य रहेगा, लेकिन आपको खान-पान का ध्यान रखना चाहिए। गोचर काल में गैर-कानूनी कार्यों से दूर रहें। इस दौरान छात्रों को मिलेजुले फल मिलेंगे।
आचार्य राजेश कुमार

Saturday, 28 September 2019

शारदीय नवरात्रि के शुभ मुहूर्त  एवं पूजा, कलश स्थापना विधि:- इस बार माँ का आगमन घोड़े पर हो रहा है । 
 शारदीय नवरात्रि इस वर्ष 29 सितंबर दिन रविवार से प्रारंभ हो रही है। इस बार शारदीय नवरात्रि 9 दिन की है। पहले दिन यानी 29 सितंबर को विधि विधान से घट या कलश स्थापना होगा। उसके बाद से नवरात्रि के व्रत प्रारंभ होंगे। इन 9 दिनों में माता के 9 स्वरुपों की पूजा-अर्चना की जाएगी। इस बार दशहरा या विजयादशमी 08 अक्टूबर को है।

शारदीय नवरात्र का इतिहास

हमारे शास्त्र के अनुसार भगवान राम ने सबसे पहले समुद्र के किनारे शारदीय नवरात्रों की पूजा की शुरूआत की थी. लगातार नौ दिन की पूजा के बाद भगवान राम ने लंका पर विजय प्राप्‍त करने के उद्देश्‍य से पूजा समाप्‍त कर आगे प्रस्‍थान किया था और भगवान राम को लंका पर विजय प्राप्ति भी हुई थी.
अतः किसी भी मनोकामना की पूर्ति हेतु माँ जगत जननी की पूजा कलश स्थापना  संकल्प लेकर प्रारम्भ करने से कार्य अवश्य सिद्ध होंगे।

नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा का वाहन क्या होगा शास्त्रों में इसे लेकर एक नियम है...

'शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे।

गुरौ शुक्रे च दोलायां बुधे नौका प्रकी‌र्ति्तता।।'

इस बार नाव पर सवार होकर आएंगी मां दुर्गा

इसका अर्थ है कि नवरात्र का प्रारम्भ यदि रविवार या सोमवार को हो तो मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं। शनिवार और मंगलवार हो तो माता घोड़े पर सवार होकर आती हैं। गुरुवार और शुक्रवार हो तो माता पालकी में आती हैं और बुधवार को मां दुर्गा  पर सवार होकर आती है।

क्योंकि इस बार पहला नवरात्र  सवार होकर आयेगी।

कलश स्थापना मुहूर्त

09 अक्‍टूबर को सुबह 9:16 पर ही इस बार अमावस्‍या समाप्‍त हो जाएगी. इसके बाद प्रतिपदा लग जाएगी, जो अगले दिन यानी 10 अक्‍टूबर को सुबह 7:25 बजे तक रहेगी. कलश स्‍थापना शुक्‍ल पक्ष प्रतिपदा को ही की जाती जाती है.

 चूंकि सूर्योदय के समय जो तिथि लगती है वह दिनभर मान्य रहती है  10 अक्टूबर 2018 को सूर्योदय में  प्रतिपदा लग जा रही है जो दिनभर रहेगी । ऐसे में जातक 10 अक्‍टूबर को सुबह 7:25 बजे तक कलश स्‍थापना कर सकते हैं. 

 अगर इस दौरान किसी वजह से आप कलश स्‍थापित नहीं कर पाते हैं तो 10 अक्‍टूबर को सुबह 11:36 बजे से 12:24 बजे तक अभिजीत मुहूर्त में भी कलश स्‍थापना कर सकते हैं. इसके पूर्व वृश्चिक लग्न जो  स्थिर लग्न है जो सुबह 9.30 से 11:15 मिनट तक रहेगी। इस शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित करना भी लाभकारी रहेगा। क्योंकि स्थिर लग्न में  जो कार्य किये जाय उसमें स्थायित्वपन होता है।

कलश स्थापना की विधि -

कलश स्थापना के लिए सबसे पहले जौ को फर्श पर डालें, उसके बाद उस जौ पर कलश को स्थापित करें। फिर उस कलश पर स्वास्तिक बनाएं उसके बाद कलश पर मौली बांधें और उसमें जल भरें। कलश में अक्षत, साबुत सुपारी, फूल, पंचरत्न और सिक्का डालें।

अखंड दीप जलाने का विशेष महत्व

दुर्गा सप्तशती के अनुसार नवरात्रि की अवधि में अखंड दीप जलाने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जिस घर में अखंड दीप जलता है वहां माता दुर्गा की विशेष कृपा होती है।

लेकिन अखंड दीप जलाने के कुछ नियम हैं, इसमें अखंड दीप जलाने वाले व्यक्ति को जमीन पर ही बिस्तर लगाकर सोना पड़ता है। किसी भी हाल में जोत बुझना नहीं चाहिए और इस दौरान घर में भी साफ सफाई का खास ध्यान रखा जाना चाहिए।

शारदीय नवरात्र‌ि में माँ दुर्गा नौ दिनों तक अपने भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। नवरात्र के नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।



नवरात्रि में नौ दिन कैसे करें नवदुर्गा साधना

माता दुर्गा के 9 रूपों का उल्लेख श्री दुर्गा-सप्तशती के कवच में है जिनकी साधना करने से भिन्न-भिन्न फल प्राप्त होते हैं। कई साधक अलग-अलग तिथियों को जिस देवी की हैं, उनकी साधना करते हैं, जैसे प्रतिपदा से नवमी तक क्रमश:-

(1) माता शैलपुत्री : प्रतिपदा के दिन इनका पूजन-जप किया जाता है। मूलाधार में ध्यान कर इनके मंत्र को जपते हैं। धन-धान्य-ऐश्वर्य, सौभाग्य-आरोग्य तथा मोक्ष के देने वाली माता मानी गई हैं। 

 

मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:।'

 (2) माता ब्रह्मचारिणी : स्वाधिष्ठान चक्र में ध्यान कर इनकी साधना की जाती है। संयम, तप, वैराग्य तथा विजय प्राप्ति की दायिका हैं।

 

मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:।'

 
(3) माता चन्द्रघंटा : मणिपुर चक्र में इनका ध्यान किया जाता है। कष्टों से मुक्ति तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए इन्हें भजा जाता है।

 

मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघंटायै नम:।'


(4) माता कूष्मांडा : अनाहत चक्र में ध्यान कर इनकी साधना की जाती है। रोग, दोष, शोक की निवृत्ति तथा यश, बल व आयु की दात्री मानी गई हैं।

 

मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्मांडायै नम:।'


(5) माता स्कंदमाता : इनकी आराधना विशुद्ध चक्र में ध्यान कर की जाती है। सुख-शांति व मोक्ष की दायिनी हैं। 

 

मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कंदमातायै नम:।'


(6) माता कात्यायनी : आज्ञा चक्र में ध्यान कर इनकी आराधना की जाती है। भय, रोग, शोक-संतापों से मुक्ति तथा मोक्ष की दात्री हैं।

 

मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कात्यायनायै नम:।'

 
(7) माता कालरात्रि : ललाट में ध्यान किया जाता है। शत्रुओं का नाश, कृत्या बाधा दूर कर साधक को सुख-शांति प्रदान कर मोक्ष देती हैं।

 

मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नम:।'


(8) माता महागौरी : मस्तिष्क में ध्यान कर इनको जपा जाता है। इनकी साधना से अलौकिक सिद्धियां प्राप्त होती हैं। असंभव से असंभव कार्य पूर्ण होते हैं।

 

मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महागौर्ये नम:।'


(9) माता सिद्धिदात्री : मध्य कपाल में इनका ध्यान किया जाता है। सभी सिद्धियां प्रदान करती हैं।

 

मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्यै नम:।'

 विधि-विधान से पूजन-अर्चन व जप करने पर साधक के लिए कुछ भी अगम्य नहीं रहता। 

 विधान- कलश स्‍थापना, देवी का कोई भी चित्र संभव हो तो यंत्र प्राण-प्रतिष्ठायुक्त तथा यथाशक्ति पूजन-आरती इत्यादि तथा रुद्राक्ष की माला से जप संकल्प आवश्यक है।  जप के पश्चात अपराध क्षमा स्तोत्र यदि संभव हो तो अथर्वशीर्ष, देवी सूक्त, रात्र‍ि सूक्त, कवच तथा कुंजिका स्तोत्र का पाठ पहले करें। गणेश पूजन आवश्यक है। ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन करने से सिद्धि सुगम हो जाती है ।

 आचार्य राजेश कुमार


Friday, 30 August 2019

हरतालिका व्रत को 'हरतालिका तीज' या 'तीजा' भी कहते हैं। इस बार यह व्रत 1 सितंबर 2019, रविवार को सुबह 5.27 से 7.52 तथा प्रदोष काल पूजा मुहूर्त शाम 17.50 से 20.09 तक है।
यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र के दिन होता है। इस दिन कुंआरी और सौभाग्यवती स्त्रियां गौरी-शंकर की पूजा करती हैं।

हरतालिका तीज व्रत पूजा का तरीका

हरतालिका तीज पर माता पार्वती और भगवान शंकर की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है-

● हरतालिका तीज प्रदोषकाल में किया जाता है। सूर्यास्त के बाद के 3 मुहूर्त को प्रदोषकाल कहा जाता है। यह दिन और रात के मिलन का समय होता है।
● हरतालिका पूजन के लिए भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की बालू रेत व काली मिट्टी की प्रतिमा हाथों से बनाएं
● पूजास्थल को फूलों से सजाकर एक चौकी रखें और उस चौकी पर केले के पत्ते रखकर भगवान शंकर, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।

● इसके बाद देवताओं का आह्वान करते हुए भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश का षोडशोपचार पूजन करें।
● सुहाग की पिटारी में सुहाग की सारी वस्तु रखकर माता पार्वती को चढ़ाना इस व्रत की मुख्य परंपरा है।

● इसमें शिवजी को धोती और अंगोछा चढ़ाया जाता है। यह सुहाग सामग्री सास के चरण स्पर्श करने के बाद ब्राह्मणी और ब्राह्मण को दान देना चाहिए।

● इस प्रकार पूजन के बाद कथा सुनें और रात्रि जागरण करें। आरती के बाद सुबह माता पार्वती को सिन्दूर चढ़ाएं व ककड़ी-हलवे का भोग लगाकर व्रत खोलें।
पौराणिक कथा

लिंग पुराण की एक कथा के अनुसार मां पार्वती ने अपने पूर्व जन्म में भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय पर गंगा के तट पर अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया। इस दौरान उन्होंने अन्न का सेवन नहीं किया। काफी समय सूखे पत्ते चबाकर काटी और फिर कई वर्षों तक उन्होंने केवल हवा पीकर ही जीवन व्यतीत किया। माता पार्वती की यह स्थिति देखकर उनके पिता अत्यंत दुखी थे।
इसी दौरान एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वतीजी के विवाह का प्रस्ताव लेकर मां पार्वती के पिता के पास पहुंचे जिसे उन्होंने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया। पिता ने जब मां पार्वती को उनके विवाह की बात बतलाई तो वे बहुत दु:खी हो गईं और जोर-जोर से विलाप करने लगीं।

फिर एक सखी के पूछने पर माता ने उसे बताया कि वे यह कठोर व्रत भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कर रही हैं जबकि उनके पिता उनका विवाह विष्णु से कराना चाहते हैं। तब सहेली की सलाह पर माता पार्वती घने वन में चली गईं और वहां एक गुफा में जाकर भगवान शिव की आराधना में लीन हो गईं।
भाद्रपद तृतीया शुक्ल के दिन हस्त नक्षत्र को माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भोलेनाथ की स्तुति में लीन होकर रात्रि जागरण किया। तब माता के इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और इच्छानुसार उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।

मान्यता है कि इस दिन जो महिलाएं विधि-विधानपूर्वक और पूर्ण निष्ठा से इस व्रत को करती हैं, वे अपने मन के अनुरूप पति को प्राप्त करती हैं। साथ ही यह पर्व दांपत्य जीवन में खुशी बरकरार रखने के उद्देश्य से भी मनाया जाता है।
उत्तर भारत के कई राज्यों में इस दिन मेहंदी लगाने और झूला झूलने की प्रथा है। विशेषकर उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल और बिहार में मनाया जाने वाला यह त्योहार करवा चौथ से भी कठिन माना जाता है, क्योंकि जहां करवा चौथ में चांद देखने के बाद व्रत तोड़ दिया जाता है, वहीं इस व्रत में पूरे दिन निर्जल व्रत किया जाता है और अगले दिन पूजन के पश्चात ही व्रत तोड़ा जाता है। इस व्रत से जुड़ी एक मान्यता यह है कि इस व्रत को करने वाली स्त्रियां पार्वतीजी के समान ही सुखपूर्वक पतिरमण करके शिवलोक को जाती हैं।
सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग को अखंड बनाए रखने और अविवाहित युवतियां मन-मुताबिक वर पाने के लिए हरितालिका तीज का व्रत करती हैं। सर्वप्रथम इस व्रत को माता पार्वती ने भगवान शिवशंकर के लिए रखा था। इस दिन विशेष रूप से गौरी-शंकर का ही पूजन किया जाता है।

इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और नहा-धोकर पूरा श्रृंगार करती हैं। पूजन के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरीशंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके साथ ही माता पार्वतीजी को सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। रात में भजन-कीर्तन करते हुए जागरण कर 3 बार आरती की जाती है और शिव-पार्वती विवाह की कथा सुनी जाती है।