Friday, 30 November 2018


क्यों खरमास में मंगल कार्यों( शादी-विवाह, मुंडन, जनेऊ संस्कार ,नूतन गृह-प्रवेश इत्यादि )को करना उत्तम नही बताया गया है/ गुरू का ध्यान सूर्यदेव पर/ खरमास में धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं, किंतु मंगल शहनाई नही बजती

       सूर्यदेव के गुरू की धनु राशि में प्रवेश करते ही 16 दिसम्बर -2018 को सायं 06.39 से खरमास प्रारम्भ  हो जाएगा एवं 15 जनवरी 2018 की रात 02.39 तक रहेगा । काशी  पंचांग के अनुसार सूर्य जब गुरू की राशि धनु या मीन में विराजमान रहते है तो उस घड़ी को खरमास माना जाता है और खरमास में मांगलिक कार्य वर्जित माने गए हैं ।  "खरमांस " प्रारम्भ होते ही  शादी -विवाह,गृह- प्रवेश, नया व्यापार, मुंडन संस्कार जनेऊ संस्कार इत्यादि नही होंगे किन्तु धार्मिक कार्य,अनुष्ठान यथावत चलते रहेंगे।


इस माह में सूर्यदेव की उपासना देगा  सर्वश्रेष्ठ फल :-

खरमास की इस अवधि में जनेऊ संस्कार, मुंडन संस्कार, नव गृह प्रवेश, विवाह आदि नहीं करना चाहिए। इसे शुभ नही माना गया है। वहीं विवाह आदि शुभ संस्कारों में गुरू एवं शुक्र की उपस्थिति आवश्यक बतायी गई है। ये सुख और समृद्धि के कारक माने गए हैं। खरमास में धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं, किंतु मंगल शहनाई नही बजती। इस माह में सभी राशि वालों को सूर्यदेव की उपासना अवश्य करनी चाहिए।


गुरू का ध्यान सूर्यदेव पर:-

इसका एक धार्मिक पक्ष यह भी माना जाता है कि जब सूर्यदेव जब बृहस्पति के घर में प्रवेश करते हैं जो देव गुरू का ध्यान एवं संपूर्ण समर्पण उन पर ही केंद्रित हो जाता है। इससे मांगलिक कार्यों पर उनका प्रभाव सूक्ष्म ही रह जाता है जिससे की इस दौरान शुभ कार्यों का विशेष लाभ नही होता। इसलिए भी खरमास में मंगल कार्यों को करना उत्तम नही बताया गया है।
16 दिसम्बर 2018  से धनु राशि में सूर्य-शनि की युति का जनमानस एवं देश विदेश की कार्यप्रणाली,अर्थव्यवस्ता तथा प्राकृतिक संतुलन पर अत्यधिक बुरा प्रभाव पड़ने वाला है:-

 धनु राशि मे पूर्व से ही शनि का गोचर हो रहा है तथा दिनांक 16 दिसम्बर-2018 को साय 06.39  पर सूर्य के भी धनु राशि मे पहुचने से सूर्य-शनि की युति प्रारम्भ हो रही है। इस युति पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि भी नही पड़ रही है । रविवार की संक्रांति दक्षिणी भारत में उत्पात मचा सकती है एवं राजनतिक उथल-पुथल के योग भी बन रहे हैं । इस संक्रांति से दैनिक उपभोग की वस्तुएं सस्ती एवं सुलभ हो सकती हैं ।

सूर्य-शनि की युति से भारत का राजनीतिक समीकरण, अर्थव्यवस्ता, विदेश नीति, महंगाई, पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। किसी प्रकरण पर न्याय पालिका का शख्त रुख हो सकता है। विदेशों में युद्ध के भी आसार हैं। प्राकृतिक आपदा के भी आसार हैं। पहाड़ी इलाको में भयंकर हिमपात, मैदानी इलाकों में ओलावृष्टि, भारीबारिश , बर्फीली हवाएं चल सकती हैं। जानमाल का नुकसान हो सकता है। किसी मशहूर शख्स का अंत भी होने के संकेत मिल रहे हैं।

अग्रिम एक माह की संक्रांति में दान-पुण्य,पूजा-पाठ पित्र की पूजा अवश्य करनी चाहिए। दान-पुण्य पूजा-पाठ से पितृलोक में पितर भी प्रसन्न होकर शुभाशीष प्रदान करते हैं बिगड़े कार्य बनाते हैं। इसके साथ ही साथ सूर्य देव भी प्रसन्न होकर निरोगता प्रदान करते हैं।
खरमास का वैज्ञानिक आधार
सूर्य की तरह गुरु गृह भी हाइड्रोजन और हीलियम की उपस्थिति से बना हुआ है। सूर्य की तरह इसका केंद्र भी द्रव्य से भरा है, जिसमें अधिकतर हाइड्रोजन ही है जबकि दूसरे ग्रहों का केंद्र ठोस है। इसलिए गुरु का भार सौर मंडल के सभी ग्रहों के सम्मिलित भार से भी अधिक है।
पृथ्वी से 15 करोड़ किलोमीटर दूर स्थित सूर्य तथा 64 करोड़ किलोमीटर दूर बृहस्पति वर्ष में एक बार ऐसी स्थिति में आते हैं जब सौर चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं के माध्यम से बृहस्पति के कण काफी मात्रा में पृथ्वी के वायुमंडल में पहुँचते हैं, जो एक-दूसरे की राशि में आकर अपनी किरणों को आंदोलित करते हैं।
इसी वजह से धनु व मीन राशि के सूर्य को खरमास/मलमास कहा जाता है ।

आचार्य राजेश कुमार  (दिव्यांश ज्योतिष केंद्र,Website:- divyanshjyotish.com)
Mail id:- rajpra.infocom@gmail.com

Thursday, 22 November 2018

गुरु नानक देव जी से जुड़ी रोचक घटनाएं:-

नहीं पिलाया गुरु नानक देव जी को पानी:-
गुरु नानक देव जी अपने शिष्यों के साथ यात्रा किया करते थे. एक बार गांव के तरफ से गुजरते हुए उन्हें अचानक प्यास लगी. चलते-चलते उनको पहाड़ी पर एक कुआं दिखाई दिया. गुरु नानक ने शिष्य को पानी लेने के लिए भेजा. लेकिन कुएं का मालिक लालची और धनी था. वो पानी के बदले धन लिया करता था. शिष्य उस लालची आदमी के पास तीन बार पानी मांगने गया और तीनों बार उसे भगा दिया गया क्योंकि उसके पास धन नहीं था. भीषण गर्मी में गुरु नानक और शिष्य अभी तक प्यासे थे. गुरु जी ने कहा- 'ईश्वर हमारी मदद जरूर करेगा.'

इसके बाद नानक जी ने मिट्टी खोदना शुरू कर दिया. थोड़ा ही खोदा था और अचानक वहां से शुद्ध पानी आने लगा. जिसके बाद गुरु जी और शिष्यों ने पानी पीकर प्यास बुझाई. गांव वाले भी देखकर वहां पानी पीने पहुंच गए. यह देखकर कुएं के मालिक को गुस्‍सा आ गया. उसने कुएं की तरफ देखा तो वो हैरान रह गया. एक तरफ पानी की धारा बह रही थी तो दूसरी तरफ कुएं का पानी कम होता जा रहा था. फिर कुएं के मालिक ने गुरु जी को जोर से पत्थर मारा. लेकिन गुरु जी ने हाथ आगे किया और पत्थर हाथ से टकराकर वहीं रुक गया. ऐसा देख कुएं का मालिक उनके चरणों पर आकर गिर गया. गुरु जी ने समझाया- "किस बात का घमंड? तुम्हारा कुछ नहीं है. खाली हाथ आए थे खाली हाथ जाओगे. कुछ करके जाओगे तो लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहोगे।


गुरु नानक जी के आशीर्वाद का रहस्य:-

         गुरु नानक देव जी अपने शिष्यों के साथ एक गांव पहुंचे. उस गांव के लोग बहुत ही बुरे थे. वो हर किसी के साथ दुर्व्यवहार किया करते थे. जैसे ही गुरु नानक पहुंचे तो गांव के लोगों ने उनके साथ बहुत दुर्व्यवहार किया और उनकी हंसी उड़ाने लगे. गुरु जी ने गांव वालों को दुर्व्यवहार ना करने के लिए समझाने की कोशिश की. लेकिन उन पर कोई असर नहीं हुआ. गुरु जी वहां से निकलने लगे. गांव वालों ने कहा- महात्मन, हमने आपकी इतनी सेवा की. जाने से पहले कम से कम आशीर्वाद तो देते जाईये. उन्हें आशीर्वाद देते हुए गुरु जी ने कहा- 'एक साथ एक जगह पर रहो.'

उसके बाद गुरुजी दूसरे गांव पहुंचे. उस गांव के लोग बहुत ही अच्छे थे. गांव के लोगों ने गुरु जी की खूब सेवा की और भरपूर अतिथि-सत्कार किया. जब गुरु जी के गांव छोड़ने का वक्त आया तो गांव वालों ने भी आशीर्वाद मांगा. उन्हें आशीर्वाद देते हुए गुरु जी ने कहा- "तुम सब उजड़ जाओ." इतना सुनकर उनके शिष्य हैरान रह गए. उन्होंने पूछा- "गुरु जी आज हम दो गावों में गए. दोनों जगह आपने अलग अलग आशीर्वाद दिए.लेकिन ये आशीर्वाद हमारे समझ में नहीं आए." जिसके बाद गुरु जी ने कहा- "एक बात हमेशा ध्यान रखो – सज्जन व्यक्ति जहां भी जाता है, वो अपने साथ सज्जनता और अच्छाई लेकर जाता है. वो जहां भी रहेगा, अपने चारों ओर प्रेम और सद्भाव का वातावरण बना कर रखेगा. अतः मैंने सज्जन लोगों से भरे गांव के लोगों को उजड़ जाने को कहा."

अन्य कहानी-

जब गुरु नानक देव जी छोटे थे. एक दिन वो चलते-चलते दूसरे मोहल्ले में चले गए. एक घर के बरामदे में महिला बैठी थी और जोर-जोर से रो रही थी. नानक बरामदे के अंदर चले गए और रोने की वजह पूछी. महिला की गोद में एक नवजात शिशु भी था. महिला ने रोते हुए उत्तर दिया- "ये मेरा पुत्र है. मैं इसके नसीब पर रो रही हूं. कहीं और जन्म ले लेता तो कुछ दिन जिंदा जी लेता. इसने मेरे घर जन्म लिया और अब ये मर जाएगा."

नानक ने पूछा- "आपको किसने कहा कि ये मर जाएगा?" महिला ने कहा- "इससे पहले जितने बच्‍चे हुए कोई नहीं बचा." नानक जी ने गोद में बच्चे को लिया. नानक बोले- "इसे तो मर जाना है ना?" महिला ने हां में जवाब दिया. फिर नानक बोले- "आप इस बच्चे को मेरे हवाले कर दो." महिला ने हामी भर दी और नानक जी ने बच्चे का नाम मरदाना रखा. नानक बोले- "अब से ये मेरा है. अभी मैं इसे आपके हवाले करता हूं. इसकी जब जरूरत पड़ेगी, मैं इसे ले जाऊंगा." नानक बाहर निकले और बच्चे की मृत्यु नहीं हुई. यहीं बालक आगे जाकर गुरु नानक जी का परम मित्र और शिष्य था. सारी उम्र उसने गुरु नानक की सेवा की.
आचार्य राजेश कुमार

गुरु नानक जयंती पर सज गए गुरुद्वारे
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 जीवनी का सार:-
इस वर्ष गुरु नानक जयंती 23 नवंबर 2018 को मनाई जाएगी. सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव के जन्मदिन को प्रकाश उत्सव के तौर पर भी मनाया जाता है. यह दिन हमेशा कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है.  इनकी जन्म तिथि अंग्रेजी कलेंडर के हिसाब से  राय भोई की तलवंडी पंजाब अब पाकिस्तान में 15 अप्रैल, 1469 मानते हैं । अब इसे ननकाना साहिब के नाम से जानते हैं। इनके जन्म की प्रचलित तिथि प्रचलित तिथि कार्तिक पूर्णिमा ही है, जो अक्टूबर-नवंबर में दीवाली के १५ दिन बाद पड़ती है।

इनके पिता का नाम कल्याणचंद या मेहता कालू जी था, माता का नाम तृप्ता देवी था। तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया। इनकी बहन का नाम नानकी था।



पढ़ने-लिखने में मन नही लगा:-

बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लड़कपन ही से ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे। पढ़ने लिखने में इनका मन नहीं लगा। ७-८ साल की उम्र में स्कूल छूट गया क्योंकि भगवत्प्रापति के संबंध में इनके प्रश्नों के आगे अध्यापक ने हार मान ली तथा वे इन्हें ससम्मान घर छोड़ने आ गए। तत्पश्चात् सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। बचपन के समय में कई चमत्कारिक घटनाएं घटी जिन्हें देखकर गाँव के लोग इन्हें दिव्य व्यक्तित्व मानने लगे। बचपन के समय से ही इनमें श्रद्धा रखने वालों में इनकी बहन नानकी तथा गाँव के शासक राय बुलार प्रमुख थे।

इनका विवाह बालपन मे सोलह वर्ष की आयु में गुरदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहनेवाले मूला की कन्या सुलक्खनी से हुआ था। ३२ वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र श्रीचंद का जन्म हुआ। चार वर्ष पश्चात् दूसरे पुत्र लखमीदास का जन्म हुआ। दोनों लड़कों के जन्म के उपरांत १५०७ में नानक अपने परिवार का भार अपने श्वसुर पर छोड़कर मरदाना, लहना, बाला और रामदास इन चार साथियों को लेकर तीर्थयात्रा के लिये निकल पडे़।
चारों ओर घूमकर उपदेश करने लगे। १५२१ तक इन्होंने तीन यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य मुख्य स्थानों का भ्रमण किया। इन यात्राओं को पंजाबी में "उदासियाँ" कहा जाता है।
नानक सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा उन्होंने सनातन मत की मूर्तिपूजा की शैली के विपरीत एक परमात्मा की उपासना का एक अलग मार्ग मानवता को दिया। उन्होंने हिंदू धर्म मे फैली कुरीतिओं का सदैव विरोध किया । उनके दर्शन में सूफीयोंं जैसी थी । साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नज़र डाली है। संत साहित्य में नानक उन संतों की श्रेणी में हैं जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है।

इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये हैं। मूर्तिपुजा, बहुदेवोपासना को ये अनावश्यक कहते थे। हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था।

जीवन के अंतिम दिनों में इनकी ख्याति बहुत बढ़ गई और इनके विचारों में भी परिवर्तन हुआ। स्वयं ये अपने परिवारवर्ग के साथ रहने लगे और मानवता कि सेवा में समय व्यतीत करने लगे। उन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जो कि अब पाकिस्तान में है और एक बड़ी धर्मशाला उसमें बनवाई। इसी स्थान पर आश्वन कृष्ण १०, संवत् १५९७ (22 सितंबर 1539 ईस्वी) को इनका परलोकवास हुआ।

मृत्यु से पहले उन्होंने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो बाद में गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए।
आचार्य राजेश कुमार





Monday, 5 November 2018


धनत्रयोदशी:-धनतेरस' स्थाई सुख, धन और समृद्धि प्राप्त करने का दिन:--
धनतेरस पर पीतल के बर्तन खरीदना होता है शुभ...
 दिवाली से ठीक दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है. दरअसल, ऐसी मान्यता है कि धनतेरस के दिन यानी धनत्रयोदशी के दिन भगवान धनवंतरी का जन्म हुआ था. तभी से धनत्रयोदशी के दिन को धनतेरस के रूप में मनाया जाने लगा और इस दिन को धन तेरस के रूप में पूजा जाता है. इस बार धनतेरस 5 नवंबर को है.
उत्तरी भारत में कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन धनतेरस का पर्व पूरी श्रद्धा व विश्वास से मनाया जाता है. देव धनवन्तरी के अलावा इस दिन, देवी लक्ष्मी जी और धन के देवता कुबेर के पूजन की परम्परा है. इस दिन कुबेर के अलावा यमदेव को भी दीपदान किया जाता है. इस दिन यमदेव की पूजा करने के विषय में एक मान्यता है कि इस दिन यमदेव की पूजा करने से घर में असमय मृ्त्यु का भय नहीं रहता है. धन त्रयोदशी के दिन यमदेव की पूजा करने के बाद घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर 4 मुख वाला दीपक पूरी रात्रि जलाना चाहिए. इस दीपक में कुछ पैसा व कौडी भी डाली जाती है.
धनतेरस 2018 का मुहूर्त-

धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त: 5 नवंबर को शाम 6.05 बजे से 8.01 बजे
शुभ मुहूर्त की अवधि: 1 घंटा 55 मिनट
प्रदोष काल: शाम 5.29 से रात 8.07 बजे तक
वृषभ काल: शाम 6:05 बजे से रात 8:01 बजे तक
त्रयोदशी तिथि आरंभ: 5 नवंबर को सुबह 01:24 बजे
त्रयोदशी तिथि खत्म: 5 नवंबर को रात्रि 11.46 बजे

इस बार ये त्योहार 5 नवम्बर 2018 (सोमवार) को मनाया जाएगा। धनतेरस पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रदोष काल के दौरान होता है जब स्थिर लग्न होती है। ऐसा माना जाता है कि अगर स्थिर लग्न के दौरान धनतेरस पूजा की जाये तो लक्ष्मीजी घर में ठहर जाती है।  दिनांक 5 नवम्बर 2018  को सायं 6.05 से 8.01   पर वृष लग्न है जिसे स्थिर लग्न माना गया है और दीवाली के त्यौहार के दौरान यह अधिकतर प्रदोष काल के साथ अधिव्याप्त होता है। अतः इस शुभ मुहूर्त में पूजा करने से धन, स्वास्थ्य और आयु बढ़ती है।

धनत्रयोदशी के दिन भगवान धनवंतरी का जन्म हुआ था और इसीलिए इस दिन को धन तेरस के रूप में पूजा जाता है. दीपावली के दो दिन पहले आने वाले इस त्योहार को लोग काफी धूमधाम से मनाते हैं. इस दिन गहनों और बर्तन की खरीदारी जरूर की जाती है। भगवान धनवंतरि' चिकित्सा के देवता भी हैं इसलिए उनसे अच्छे स्वास्थ्य की भी कामना की जाती है।

देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन मे प्रगत हुए थे भगवान धन्वन्तरी

शास्त्रों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान त्रयो‍दशी के दिन भगवान धनवंतरी प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन को धन त्रयोदशी कहा जाता है. धन और वैभव देने वाली इस त्रयोदशी का विशेष महत्व माना गया है. 

कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय बहुत ही दुर्लभ और कीमती वस्तुओं के अलावा शरद पूर्णिमा का चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी के दिन कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धनवंतरी और कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को भगवती लक्ष्मी जी का समुद्र से अवतरण हुआ था. यही कारण है कि दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन और उसके दो दिन पहले त्रयोदशी को भगवान धनवंतरी का जन्म दिवस धनतेरस के रूप में मनाया जाता है.

भगवान धनवंतरी को प्रिय है चाँदी और पीतल 
भगवान धनवंतरी को नारायण भगवान विष्णु का ही एक रूप माना जाता है. इनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें से दो भुजाओं में वे शंख और चक्र धारण किए हुए हैं. दूसरी दो भुजाओं में औषधि के साथ वे अमृत कलश लिए हुए हैं. ऐसा माना जाता है कि यह अमृत कलश पीतल का बना हुआ है क्योंकि पीतल भगवान धनवंतरी की प्रिय धातु है।

चांदी खरीदना भी शुभ:-
धनतेरस के दिन लोग घरेलू बर्तन खरीदते हैं, वैसे इस दिन चांदी खरीदना शुभ माना जाता है क्योंकि चांदी चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है और चन्द्रमा शीतलता का मानक है, इसलिए चांदी खरीदने से मन में संतोष रूपी धन का वास होता है क्योंकि जिसके पास संतोष है वो ही सही मायने में स्वस्थ, सुखी और धनवान है।

मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई कोई भी वस्तु शुभ फल प्रदान करती है और लंबे समय तक चलती है. लेकिन अगर भगवान की प्रिय वस्तु पीतल की खरीदारी की जाए तो इसका तेरह गुना अधिक लाभ मिलता है.

क्यों है पूजा-पाठ में पीतल का इतना महत्व ?  
शुद्ध पीतल का निर्माण तांबा और जस्ता धातुओं के मिश्रण से किया जाता है. सनातन धर्म में पूजा-पाठ और धार्मिक कर्म हेतु पीतल के बर्तन का ही उपयोग किया जाता है. 
ऐसा ही एक किस्सा महाभारत में वर्णित है कि सूर्यदेव ने द्रौपदी को पीतल का अक्षय पात्र वरदानस्वरूप दिया था जिसकी विशेषता थी कि द्रौपदी चाहे जितने लोगों को भोजन करा दें, खाना घटता नहीं था।

यम के पूजा का भी विधान और इससे संबन्धित किव्यदंती:-
धनतेरस के दिन कुबेर के अलावा देवता यम के पूजा का भी विधान है। धनतेरस के दिन यम की पूजा के संबंध में मान्यता है कि इनकी पूजा से घर में असमय मौत का भय नहीं रहता है।

          एक किवदन्ती के अनुसार एक राज्य में एक राजा था, कई वर्षों तक प्रतिक्षा करने के बाद, उसके यहां पुत्र संतान कि प्राप्ति हुई. राजा के पुत्र के बारे में किसी ज्योतिषी ने यह कहा कि, बालक का विवाह जिस दिन भी होगा, उसके चार दिन बाद ही इसकी मृ्त्यु हो जायेगी.


         ज्योतिषी की यह बात सुनकर राजा को बेहद दु:ख हुआ, ओर ऎसी घटना से बचने के लिये उसने राजकुमार को ऎसी जगह पर भेज दिया, जहां आस-पास कोई स्त्री न रहती हो, एक दिन वहां से एक राजकुमारी गुजरी, राजकुमार और राजकुमारी दोनों ने एक दूसरे को देखा, दोनों एक दूसरे को देख कर मोहित हो गये, और उन्होने आपस में विवाह कर लिया.


             ज्योतिषी की भविष्यवाणी के अनुसार ठीक चार दिन बाद यमदूत राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचें. यमदूत को देख कर राजकुमार की पत्नी विलाप करने लगी. यह देख यमदूत ने यमराज से विनती की और कहा की इसके प्राण बचाने का कोई उपाय बताईयें. इस पर यमराज ने कहा की जो प्राणी कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की त्रयोदशी की रात में जो प्राणी मेरा पूजन करके दीप माला से दक्षिण दिशा की ओर मुंह वाला दीपक जलायेगा, उसे कभी अकाल मृ्त्यु का भय नहीं रहेगा. तभी से इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाये जाते
सधन्यवाद,
आपका
आचार्य राजेश कुमार


"दिव्यांश ज्योतिष् केंद्र"

सभी सुखों को प्रदान करने वाली महालक्ष्मी जी की अत्यंत प्राचीन और दुर्लभ सिद्ध मंत्र :- प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के द्वारा राजाओं-महाराजाओं के यहाँ स्थाई सुख शांति हेतु ने वाला पूजन:-

प्रिय मित्रो
प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के द्वारा राजाओं-महाराजाओं के यहाँ स्थाई सुख शांति हेतु समय-समय पर पूजा-पाठ अनुष्ठान किये जाते थे जिस कारण उनके यहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी "समृद्धता " बनी रहती थी।

इन्हीं अनुष्ठानों में से "महालक्ष्मी" जी की एक अति दुर्लभ और अचूक अनुष्ठान जो अमावस्या में मुख्यतः मकर संक्रांति और दीपावली में किये जाते हैं। जिसे "सहस्त्ररूपा सर्व्यापी लक्ष्मी " कहा जाता है।

                                  "सहस्त्ररूपा सर्व्यापी लक्ष्मी साधना विधि "

         प्रत्येक वर्ष दीपावली या मकर संक्रांति के दिन सर्वत्र विद्यमान, सर्व सुख प्रदान करने वाली माता "महाँ लक्ष्मी जी" की पूजन करने की विधि बताई जाती है।
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी हम चाहते हैं की आप सभी मित्र अपने-अपने घरों या दुकानों में सपरिवार इस पूजा को करके माँ को अपने घर में पुनः सविराजमान करें।
    यह पूजन समस्त ग्रहों की महादशा या अन्तर्दशा के लिए लाभप्रद होता है। वैसे जिनकी शुक्र की दशा चल रही हो वो तो ज़रूर करें।
इस विधि से माता लक्ष्मी की पूजा करने से "सहस्त्ररुपा सर्व व्यापी लक्ष्मी" जी सिद्ध होती हैं। इस पूजा को सिद्ध करने का समय इस वर्ष दीपावली को अपरान्ह 2.00 pm से 4.00 pm के मध्य या रात्रि 11.30 pm से 02.57am के मध्य किया जायेगा।

     जो भक्तजन "सहस्त्र रुपा सर्वव्यापी लक्ष्मी "पूजन करते हैं उनके आमदनी के नये-नये लक्षण बनने लगते हैं।आर्थिक उन्नति,पारिवारिक समृद्धता ,व्यापार में बृद्धि,यश, प्रसिद्धि बढ़ने लगती है। दरिद्रता और क़र्ज़ समाप्त होने लगता है। पति-पत्नी के बीच कलह समाप्त होने लगता है। सभी प्रकार के मानोवांछित फल प्राप्त होने लगते हैं।

लक्ष्मी का तात्पर्य केवल धन ही नही होता, बल्कि जीवन की समस्त परिस्थितियों की अनुकूलता ही लक्ष्मी कही जाती हैं।

सहस्त्र रुपा सर्व व्यापी लक्ष्मी का अर्थ 1-धन लक्ष्मी,2-स्वास्थ्य लक्ष्मी 3-पराक्रम लक्ष्मी 4-सुख लक्ष्मी 5-संतान लक्ष्मी 6-शत्रु निवारण लक्ष्मी 7-आनंद लक्ष्मी 8- दीर्घायु लक्ष्मी 9-भाग्य लक्ष्मी 10-पत्नी लक्ष्मी 11-राज्य सम्मान लक्ष्मी 12 वाहन लक्ष्मी 13-सौभाग्य लक्ष्मी 14-पौत्र लक्ष्मी 15-राधेय लक्ष्मी इत्यादि-इत्यादि होता है।

इस पूजन को विशेष रूप से अमावस्या को अर्ध रात्रि में किया जाना अत्यंत शुभ फलदायी होता है। प्रत्येक दीपावली एवं मकर संक्रांति के दिन अमावस्या होती है अतः इसी दिन यह पूजा करना लाभ प्रद होता है।

                                                            सामग्री

1.श्री यंत्र ( ताम्बा,चांदी या सोने का) एक
2.
तिल का तेल 500 ग्राम
3.
मिट्टी की 11 दियाली
4.
रुइ बत्ती लंबी वाली 22
5.
केसर
6.
गुलाब या चमेली या कमल के 108 फूल
7.
दूध ,दही,घी,शहद और गंगा जल
8.
सफेद रुमाल
9.
साबुत कमल गट्टा दाना 108 को किसी ताम्बे के कटोरे में पिघला घी मे डाल कर रखें।
10.
कमल गट्टे की माला एक
11.
आम की लकड़ी 1.5kg
12.
पिलि धोती,पिला तौलिया या गमछा
13.
ताम्बा या पीतल या चांदी की बड़ी परात( जिसमे उपरोक्त समान आ सके)
14.
फूल या पीतल का भगौना या अन्य पात्र

नोट- इस पूजा में किसी भी प्रकार का स्टील या लोहे का बर्तन का प्रयोग वर्जित है।।

                                                   पूजन विधि:-

सर्व प्रथम स्नान करके पिला वस्त्र पहन कर उपरोक्त समस्त सामान पूजा स्थल पर अपने पास रख लें और पूरब या उत्तर की ओर मुह करके बैठ जाएं।

अब अपने सामने परात रखें। उस परात के ठीक बीच में श्री यंत्र को रख दें अब श्री यंत्र के चारो तरफ 11 तिल के तेल का दीपक ऐसे रखें की दीपक की लौ साधक की ओर होनी चाहिए।
यदि पत्नी बैठें थो अपने दाहिनी तरफ बैठाएं।
अब दीपक को थाली के बाहर कर लें। परात के केंद्र में स्वस्तिक का निशान बनावें। श्री यंत्र पर 11 बिंदी लगावें । ग्यारहवी बिंदी यंत्र के केंद्र में थोड़ा बड़ी बिंदी लगा कर परात के केंद्र पर रख दें। अब गणपति एवं विष्णु जी का बारी-बारी ध्यान करके हाथ में जल अक्षत पुष्प लेकर "ऊँ श्रीं श्रीं सहस्त्र रुपा सर्व व्यापी लक्ष्मी"जी का पूजन करने हेतु संकल्प ले एवं हाथ की सामग्री पृथ्वी पर गिरा दें। अब परात में रखे 11 दीपक परात से बाहर निकालें।
अब श्री यंत्र को किसी पीतल या फूल के पात्र में क्रमशः दूध, दही, घी, शहद, शक्कर से स्नान कर कर अब गंगा जल से स्नान कराकर यंत्र को सफेद कपड़े से अच्छी तरह पोछ लें। स्नान कराने पर जो सामग्री फूल य पीतल के पात्र मे इकट्ठा हुई वही सामग्री पूजन के पश्चात प्रसाद रूप में ग्रहण की जायेगी। प्रसाद हेतु मिश्री डालकर खीर बनाकर अर्पित कर सकते हैं।

अब परात के बीच में पुनः स्वस्तिक का निशान बना कर श्री यंत्र को स्थापित करके पहले की तरह उस पर 11 बिंदी केशर की लगाएं। तत्पश्चात धूप बत्ती या अगर बत्ती प्रज्वलित करें एवं यंत्र के चारो तरफ पहले की तरह उन दीपक को लगा कर कमल गट्टे की माला से निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए एक -एक फूल बारी बारी से प्रत्येक मंत्र के पश्चात स्वाहा बोलते हुए श्री यंत्र पर 108 पुष्पों को (आप या आपकी पत्नी या कोई अन्य) रखते जाय।
मंत्र है --||"ऊँ श्रीं -श्रीं सहस्त्र-रुपा सर्व- व्यापी लक्ष्मी सिद्धये श्रीं-श्रीं ऊँ नमः"||

अब हवन पात्र में आम की लकड़ी रख कर अग्नि प्रज्ज्वलित कर के कमल गट्टे की माला से पुनः उपरोक्त मंत्र एवं स्वाहा के उच्चारण के साथ एक एक कमल गट्टे के दाने को घी सहित किसी आम्र- पल्लव या ताम्बे के चम्मच से थोड़ा थोड़ा घी सहित हवन कुण्ड में डालते जाएं। अंतिम मंत्र के साथ कटोरे का समस्त घी अग्नि मे डाल दें। अब आपकी पूजा सम्पन्न हुई । अब मुख्यतःलक्ष्मी गणेश जी की आरती घी के दीपक से करके प्रसाद को माँ लक्ष्मी एवं अग्नि देव को ग्रहण करावें। तत्पश्चात अब घर के सदस्य आरती लेकर उस प्रसाद को ग्रहण करें।इस पूजा मे आप सफेद मिष्ठान भी चढा सकते है।

अब आपकी पूजा पूर्णरूप से सम्पन्न हुई। पूजा के पश्चात रात्रि 4.30 बजे तक सोना नहीं चाहिए आप पूजा के पश्चात भजन कीर्तन कर या सुन सकते हैं।
सुबह आप श्री यंत्र को पूजा में या आलमारी के लोकर में या दुकान में या कहीं भी पवित्र स्थान पर लाल कपड़े में लपेट कर रख सकते हैं।
सधन्यवाद,
आचार्य राजेश कुमार